अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी कूटनीतिक असभ्यता का प्रदर्शन किया, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेन्स्की के साथ अपमानजनक व्यवहार किया। आमतौर पर, जब दो देशों के राष्ट्राध्यक्ष मिलते हैं, तो एक-दूसरे के साथ समान स्तर पर व्यवहार किया जाता है, चाहे देश का आकार या जनसंख्या कुछ भी हो। लेकिन ट्रंप ने इस परंपरा को तोड़ते हुए ज़ेलेन्स्की को धमकाने की नीति अपनाई, जिससे यह घटना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इतिहास में एक उदाहरण बन गई।
व्हाइट हाउस में हुई इस बैठक के दौरान ट्रंप ने यूक्रेन पर दबाव बनाने की कोशिश की कि वह पहले शांति प्रस्ताव को स्वीकार करे, जबकि रूस के आक्रमण से सुरक्षा का मुद्दा बाद में सुलझाया जाएगा। ज़ेलेन्स्की ने स्पष्ट रूप से कहा कि शांति वार्ता में यूक्रेन की भागीदारी अनिवार्य है, लेकिन ट्रंप इससे सहमत नहीं थे। उनके इस रवैये के पीछे यूक्रेन के खनिज संसाधनों पर नियंत्रण हासिल करने की मंशा झलक रही थी।
इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब विश्व नेताओं ने कूटनीतिक शिष्टाचार की सीमाएं पार की हैं। 1960 में, सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में बहस के दौरान अपना जूता निकालकर मेज पर पटक दिया था। ट्रंप का व्यवहार भी उसी तरह की अभद्रता का उदाहरण है। इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सहयोगियों ने भी आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया, जिसमें किसी ने ज़ेलेन्स्की को थप्पड़ मारने की बात कही, तो किसी ने उन्हें अपशब्द कहे।
ट्रंप की यह नीति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुए याल्टा सम्मेलन की याद दिलाती है, जब अमेरिका, ब्रिटेन और रूस ने दुनिया के विभाजन की योजना बनाई थी। इसी बैठक के बाद इज़राइल और सऊदी अरब जैसे राष्ट्र अस्तित्व में आए। फिलिस्तीन के एक बड़े हिस्से को काटकर यहूदी राष्ट्र बनाया गया, क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी में यहूदियों पर अत्याचार किए गए थे। आज भी जर्मनी के ऑशविट्ज़ में उन यातना शिविरों को देखा जा सकता है।
आज गाजा पट्टी में इज़राइल की बमबारी ने पूरे क्षेत्र को तबाह कर दिया है। ट्रंप की सोच यह रही है कि गाजा को मध्य पूर्व का एक नया विकसित क्षेत्र बना दिया जाए और वहां के फिलिस्तीनी नागरिकों को अन्य देशों में शरण लेने के लिए मजबूर किया जाए। लेकिन यह कैसे संभव हो सकता है कि कोई अपनी जन्मभूमि छोड़कर शरणार्थी बनकर दूसरे देश में जा बसे? खासकर तब जब यूरोप के कई देशों में मुस्लिम शरणार्थियों के प्रति घृणा बढ़ रही है। जर्मनी में एक राजनीतिक दल ने मुस्लिम शरणार्थियों को अपराध बढ़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया और युवा मतदाताओं ने इस विचार का समर्थन भी किया।
ट्रंप की आक्रामक विदेश नीति और दबाव बनाने की रणनीति न केवल यूक्रेन के लिए चुनौती है, बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी खतरा बन सकती है।
