दिल्ली चुनाव: जातीय समीकरण और मुफ्त योजनाओं की सियासी चालें

दिल्ली के चुनावी मैदान में इस बार जातिगत समीकरणों और मुफ्त योजनाओं पर गहरी रणनीति देखने को मिली। भाजपा ने उन जातियों पर ध्यान दिया, जो संख्या में कम होने के बावजूद अपनी अस्मिता को लेकर सजग हैं, जैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बेलदार, जिनकी दिल्ली में भी अच्छी-खासी आबादी है। इसी तरह, अन्य छोटी जातियों के नेताओं को झुग्गी-झोपड़ी और पुनर्वास कॉलोनियों में लगाया गया ताकि जमीनी स्तर पर समर्थन जुटाया जा सके।

दलित वोट बैंक पर भाजपा की नजर
भाजपा जानती थी कि उसे अक्सर पंजाबी और बनियों की पार्टी माना जाता है, जिससे दलित मतदाता उससे दूरी बनाए रखते हैं। इस छवि को तोड़ने के लिए गृह मंत्री अमित शाह ने कई सभाओं में यह मुद्दा उठाया कि अरविंद केजरीवाल ने पंजाब में दलित उपमुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था लेकिन पूरा नहीं किया। करोलबाग से चुनाव लड़ रहे भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और दलित नेता दुष्यंत गौतम के समर्थन में यह संकेत भी दिया गया कि भाजपा सत्ता में आई तो दलित मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री बन सकता है। इससे कांग्रेस के दलित एजेंडे को चुनौती देने और भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने के नैरेटिव को कमजोर करने की कोशिश की गई।

केजरीवाल की रणनीति और भाजपा का जवाब
आम आदमी पार्टी (AAP) ने जातिगत राजनीति के बजाय अपनी मुफ्त योजनाओं पर भरोसा किया। उसने बिजली, पानी, महिलाओं की मुफ्त बस यात्रा और नकद सहायता देने के वादे किए। लेकिन भाजपा ने इसे भी काटने की रणनीति अपनाई। भाजपा ने यह संदेश फैलाया कि अब मुफ्त सुविधाएं सिर्फ आप ही नहीं दे रही, बल्कि भाजपा शासित राज्यों—मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में भी महिलाओं को नकद सहायता दी जा रही है।

इसके अलावा, भाजपा ने इस मुद्दे को भी उछाला कि केजरीवाल ने दिल्ली की महिलाओं को ₹1100 महीना देने का वादा किया था, लेकिन पूरा नहीं किया। पंजाब में भी इसी तरह का वादा तीन साल बाद भी अधूरा है। भाजपा ने इसे AAP की वादाखिलाफी बताकर जनता को अपनी योजनाओं की ओर आकर्षित किया।

झुग्गी-झोपड़ी और बाहरी राज्यों के मतदाता
दिल्ली की झुग्गी बस्तियों और पुनर्वास कॉलोनियों में ज्यादातर लोग बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और झारखंड से आए हुए हैं। भाजपा ने इन राज्यों के नेताओं को ग्राउंड लेवल पर लगाया और यह संदेश दिया कि भाजपा भी मुफ्त योजनाएं दे रही है, इसलिए AAP कोई अलग नहीं है।

अंतिम दांवपेंच
चुनाव के आखिरी समय तक भाजपा और आप के बीच रणनीति का मुकाबला चलता रहा। भाजपा ने जातिगत संतुलन और मुफ्त योजनाओं को केंद्र में रखा, जबकि AAP ने अपने पुराने मॉडल पर भरोसा किया। हालांकि, भाजपा ने हर उस मुद्दे पर प्रबंधन किया, जिससे आम आदमी पार्टी को बढ़त मिलने की संभावना थी।

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