नीतीश कुमार की राजनीति को समझना किसी पहेली को सुलझाने जैसा है। दशकों से बिहार की सत्ता पर उनकी पकड़ बनी हुई है, और उनकी राजनीतिक चालें अक्सर भविष्यवक्ताओं और विश्लेषकों की भविष्यवाणियों को गलत साबित कर देती हैं। चाहे वह लालू यादव हों या प्रशांत किशोर, जिसने भी उनके राजनीतिक करियर को लेकर कोई आकलन किया, नीतीश कुमार ने समय-समय पर सभी को चौंका दिया।
नीतीश कुमार कब, किस ओर रुख करेंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। 2004 से अब तक, बिहार की राजनीति में वे एक केंद्रीय किरदार बने हुए हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही फिर से अटकलें लगाई जा रही हैं—क्या वे सत्ता में बने रहेंगे, या इस बार कोई नई रणनीति अपनाएंगे?
बीजेपी आलाकमान लगातार संकेत दे रहा है कि बिहार चुनाव में नेतृत्व नीतीश कुमार के हाथों में ही रहेगा। हालांकि, बीजेपी को उनकी ‘पलटीमार राजनीति’ का भी पूरा अंदाजा है। पिछले दो दशकों में वे हर बड़े राजनीतिक दौर का हिस्सा रहे हैं—आडवाणी और वाजपेयी के दौर से लेकर मोदी और अमित शाह के युग तक।
2023 में जब अमित शाह ने कहा था कि एनडीए के दरवाजे नीतीश कुमार के लिए हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि 2024 में वे फिर से एनडीए का हिस्सा बन जाएंगे। यही उनकी राजनीति की खासियत है—हर हाल में प्रासंगिक बने रहना। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार वो धुरी हैं, जिसके बिना सत्ता का संतुलन बनाना मुश्किल लगता है। ऐसे में 2025 का चुनाव क्या कोई नई कहानी लिखेगा, या फिर नीतीश कुमार एक बार फिर साबित करेंगे कि बिहार की राजनीति में उनकी जगह अटल है? यह देखना दिलचस्प होगा।
