डोनाल्ड ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति बनने से पहले और बाद में पनामा नहर को लेकर कई विवादास्पद दावे किए। उन्होंने कहा कि अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ने वाली इस महत्वपूर्ण नहर पर चीन का नियंत्रण है और अमेरिकी जहाजों से अन्य देशों की तुलना में अधिक शुल्क लिया जा रहा है। उन्होंने धमकी दी कि यदि यह स्थिति नहीं बदली तो अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप कर सकता है।
हालांकि, पनामा नहर के प्रशासक रिकोर्टे वास्क्यूज ने ट्रंप के इन दावों का खंडन किया। वास्क्यूज ने स्पष्ट किया कि नहर का नियंत्रण चीन के हाथों में नहीं है। 1997 में हांगकांग की एक कंपनी ने नहर के कुछ बंदरगाहों का प्रबंधन करने का ठेका जीता था, लेकिन नहर का संचालन पूरी तरह पनामा नहर प्राधिकरण द्वारा किया जाता है।
पनामा नहर 82 किलोमीटर लंबी एक जलमार्ग है जो प्रशांत महासागर को कैरेबियन सागर से जोड़ती है। इसे 1904-1914 के बीच अमेरिका ने बनाया था और दशकों तक इसका नियंत्रण अमेरिका के पास रहा। लेकिन 1977 में कार्टर-टोरीज संधि के तहत पनामा को 1999 में इसका नियंत्रण सौंप दिया गया।
ट्रंप के आरोपों के जवाब में पनामा के राष्ट्रपति जोस राउल मुलिनो ने कहा कि नहर और उसके आस-पास का क्षेत्र पूरी तरह पनामा का है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी जहाजों से अधिक शुल्क नहीं लिया जा रहा।
कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हांगकांग की कंपनी सीके हचिसन होल्डिंग्स, जो नहर के प्रवेश द्वारों पर बंदरगाहों का प्रबंधन करती है, पनामा नहर से गुजरने वाले जहाजों का डेटा जुटा सकती है, जिससे जासूसी की संभावना है। हालांकि, चीन ने पनामा की संप्रभुता का सम्मान करने की बात कही है।
