पहाड़ों में रहने वाली बेटियां अब सिर्फ घर-खेत तक सीमित नहीं रहीं। कभी जिन हाथों में दरांती, फावड़ा और घरेलू काम हुआ करते थे, आज उन्हीं हाथों में क्रिकेट का बल्ला है। ये बेटियां मैदान में उतरकर जोरदार छक्के-चौके लगा रही हैं और अपनी अलग पहचान बना रही हैं।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाकों में संसाधनों की कमी हमेशा से रही है। सही मैदान, कोच और सुविधाएं मिलना आसान नहीं था। इसके बावजूद इन बेटियों ने हार नहीं मानी। रोजमर्रा के काम निपटाने के बाद ये लड़कियां खाली मैदान, स्कूल के ग्राउंड या सड़क के किनारे अभ्यास करती हैं। कई बार बल्ला-गेंद भी खुद के पैसों से खरीदनी पड़ती है।
परिवार और समाज का साथ भी धीरे-धीरे मिलने लगा है। पहले जहां लोग बेटियों के खेलने पर सवाल उठाते थे, अब उनकी मेहनत और सफलता देखकर गर्व महसूस करते हैं। कुछ बेटियां जिला और राज्य स्तर पर खेल चुकी हैं, तो कुछ का सपना राष्ट्रीय टीम तक पहुंचने का है।
इन पहाड़ी बेटियों का कहना है कि क्रिकेट ने उन्हें आत्मविश्वास दिया है। खेल के जरिए वे न सिर्फ अपना भविष्य संवारना चाहती हैं, बल्कि दूसरी लड़कियों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देना चाहती हैं।
पहाड़ की ये ‘धाकड़’ बेटियां साबित कर रही हैं कि अगर हौसला मजबूत हो, तो हालात कितने भी कठिन हों, सपनों को उड़ान जरूर मिलती है।
पहाड़ की ‘धाकड़’ बेटियां: दरांती से क्रिकेट बैट तक का सफर
