वृंदावन के प्रमुख संत प्रेमानंद महाराज ने एक गहरे और निजी प्रवचन में बताया कि कैसे उन्होंने बचपन में अपने पिता से “मैं संत बनना चाहता हूँ” कहकर आज्ञा मांगी थी — और पिता का जवाब इतना सहायक और प्रेम भरा था कि वह आज भी उसे अपनी ताकत मानते हैं
1. संन्यासी बनने की इच्छा
प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचन में साझा किया कि उन्होंने जीवन में संत बनने का निर्णय बहुत छोटी उम्र में ही लिया था।
2. पिता की प्रतिक्रिया
जब उन्होंने अपने पिता को यह इच्छा बताई, तो तीन दिन बाद उनके पिता उन्हें खोजने आए।
महाराज जी ने बताया कि पिता ने पहले विनम्रता से कहा, “उठो,” लेकिन जब वे नहीं उठे तो उन्होंने कठोर स्वर में कहा। डर के बावजूद प्रेमानंद जी ने खड़े होकर अपने निर्णय पर जोर दिया और कहा कि उनका जीवन अब ईश्वर की भक्ति और संन्यासी मार्ग को समर्पित है — और वे घर वापस नहीं लौट सकते।
3. पिता का आशीर्वाद
उनके पिता ने अंततः उन्हें गले लगाया, “राम-राम-राम” कहते हुए तीन बार कहा और उन्हें आज्ञा दी।
उन्होंने यह आशीर्वाद भी दिया कि अगर वे संन्यासी बने तो “बंजर भूमि में भी बैठोगे तो फूल खिल उठेंगे” — यह एक सुंदर रूपक था, जो पिता की गहरी श्रद्धा और विश्वास को दर्शाता है।
4. पारिवारिक विश्वास और प्रेरणा
प्रेमानंद महाराज ने यह भी कहा कि पिता का यह प्रेम और आशीर्वाद आज भी उनके साथ है।
उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया कि माता-पिता का आशीर्वाद वास्तव में ईश्वर का आशीर्वाद होता है — यह उनके आध्यात्मिक जीवन की नींव बना।
5. अन्य ऐतिहासिक संदर्भ
संत प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि उनके पिता बचपन से ही संतों की सेवा करते थे।
उनकी स्वास्थय स्थिति और पदयात्रा (पैदल यात्रा) को लेकर हाल में अफवाहें भी थीं, लेकिन भक्तों ने
पुष्टि की कि वे स्वस्थ हैं।
