बिहार में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं, और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए यह राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है। माना जा रहा है कि यह उनका आखिरी चुनाव हो सकता है, इसलिए वे इसे किसी भी कीमत पर जीतना चाहेंगे। लेकिन उनके सामने विपक्ष की बड़ी चुनौती खड़ी है। तेजस्वी यादव से लेकर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर तक उनके विजय रथ को रोकने की कोशिशों में जुटे हैं।
चुनावी साल में बजट का खास महत्व होता है। जनता को इससे बड़ी उम्मीदें होती हैं, वहीं विपक्ष इसे सरकार को घेरने के अवसर के रूप में देखता है। यही वजह है कि बिहार विधानसभा में बजट पेश होने से पहले ही विपक्षी नेता एक्टिव हो गए। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने महिलाओं को हर महीने 2500 रुपये देने की मांग उठाई। इसके अलावा, उन्होंने वृद्धा पेंशन बढ़ाकर 1500 रुपये करने, 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने और गैस सिलेंडर की कीमत 500 रुपये करने की भी मांग रखी। विपक्ष के विधायक भी विधानमंडल परिसर में प्रदर्शन करते नजर आए और सरकार पर वादों को लेकर दबाव बनाया।
हालांकि, बिहार की आर्थिक स्थिति को समझने वाले जानते हैं कि ऐसी घोषणाओं को पूरा करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। वादे करना सरल होता है, लेकिन उन्हें हकीकत में बदलना कठिन। इन सबके बीच बिहार के उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री सम्राट चौधरी ने 2025-26 का बजट विधानसभा में पेश किया। बजट के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई बार संतुष्ट नजर आए—कभी मुस्कुराते, तो कभी मेज थपथपाते दिखे। और जब बजट भाषण खत्म हुआ, तो उन्होंने सम्राट चौधरी को गले लगा लिया, मानो उन्होंने उनकी दिली इच्छा पूरी कर दी हो।
बिहार का यह बजट न सिर्फ आर्थिक नीतियों को दिशा देगा, बल्कि आगामी चुनाव की रणनीति तय करने में भी अहम भूमिका निभाएगा।
