एक पिता ने अपनी बेटी की इज़्ज़त और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए रेलवे व्यवस्था से टक्कर ले ली और अंत में जीत भी हासिल की। घटना एक छोटे शहर के रेलवे स्टेशन की है। पिता रोज़ की तरह अपनी 17 वर्षीय बेटी को ट्रेन से कॉलेज भेजने आए थे। ट्रेन में अक्सर भीड़ रहती थी, और कुछ शरारती लड़के सफर के दौरान छात्राओं पर फब्तियां कसते, धक्का-मुक्की करते और परेशान करते थे। बेटी ने यह बात कुछ दिनों बाद हिम्मत करके पिता को बताई। उस दिन भी ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आई तो वही लड़के मौजूद थे। पिता ने पहले शांति से रेलवे पुलिस और स्टेशन मास्टर से मदद मांगी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई न होने पर पिता खुद आगे खड़े हो गए।
ट्रेन रुकते ही पिता ने उन लड़कों को टोका और रेलवे सिक्योरिटी को आवाज़ दी। पहले बहस हुई, लेकिन पिता डटे रहे और नियमों का हवाला देते हुए महिलाओं-छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। पिता के विरोध के बाद रेलवे पुलिस को तुरंत हरकत में आना पड़ा और लड़कों को पकड़ा गया। पिता ने लिखित शिकायत भी दर्ज कराई। मामले की जांच हुई और रेलवे प्रशासन ने छात्राओं के डिब्बे में सुरक्षा बढ़ाने, RPF की गश्त लगाने और कॉलेज समय वाली ट्रेनों में महिला सुरक्षा बल तैनात करने का आदेश जारी किया।
बेटी को इंसाफ मिला और पिता की जिद ने साबित कर दिया—सम्मान की लड़ाई अगर सच्चाई से लड़ी जाए, तो सिस्टम भी झुकता है और न्याय भी मिलता है।
