भारत की जेलों में बंद कैदियों को लेकर सामने आए आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। हर चार में से तीन कैदी ऐसे हैं जिन्हें अदालत ने अब तक दोषी करार नहीं दिया है, फिर भी वे सालों से जेल की सलाखों के पीछे हैं। ये सभी विचाराधीन कैदी हैं, जिनकी सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक, भारत की जेलों में बंद कुल कैदियों में से करीब 75% विचाराधीन हैं। यानी वे सिर्फ इसलिए जेल में हैं क्योंकि उनका मुकदमा लंबित है या वे ज़मानत नहीं ले पाए हैं।
क्यों हो रही देरी?
अदालतों में लंबित मामलों की भरमार
गरीब कैदियों के पास कानूनी मदद नहीं
पुलिस जांच और अदालत की सुनवाई में देरी
ज़मानत की प्रक्रिया जटिल और खर्चीली
नतीजा – जेलें भर रही हैं, इंसाफ लटक रहा है
जेलों में क्षमता से ज्यादा भीड़ है। कई विचाराधीन कैदी ऐसे हैं जो अगर दोषी भी ठहराए जाएं, तो उन्हें मिलनी वाली सजा से ज्यादा समय वे पहले ही जेल में काट चुके होते हैं।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह स्थिति न्याय के अधिकार का उल्लंघन है। वे सुझाव देते हैं कि
अदालतों की संख्या बढ़ाई जाए
मुफ़्त कानूनी सहायता को सशक्त किया जाए
ज़मानत की शर्तें सरल और व्यावहारिक बनाई जाएं
जब तक ये कदम नहीं उठाए जाते, तब तक इंसाफ का पहिया वहीं अटका रहेगा, और हजारों निर्दोष लोग जेल में सड़ते रहेंगे।
