संसद के सत्र में राज्यसभा के अंदर बड़ा हंगामा तब शुरू हुआ, जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने भाषण के दौरान सभापति जगदीप धनकड़ का नाम सीधे ले लिया। खड़गे ने कहा कि वह “निराश” हैं क्योंकि सदन में विपक्ष को अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सभापति का रवैया कभी-कभी “एकतरफा” लगता है, जिससे लोकतंत्र की भावना कमजोर होती है।
जैसे ही उन्होंने धनकड़ का नाम लिया और यह टिप्पणी की, सत्ता पक्ष के सांसद नाराज़ हो गए। उन्होंने खड़गे की बात को सभापति की गरिमा के खिलाफ बताया और तुरंत विरोध शुरू कर दिया। भाजपा और सहयोगी दलों के सदस्यों ने नारेबाज़ी की और कहा कि किसी भी सदस्य को सभापति पर सीधा व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाना चाहिए।
हंगामा बढ़ने पर सभापति धनकड़ ने भी सख्त प्रतिक्रिया दी और कहा कि सदन के नियम सभी पर लागू होते हैं और वह निष्पक्ष बने हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सदन चलाने की जिम्मेदारी संविधान और नियमों के अनुसार निभाई जाती है, किसी दबाव में नहीं।
इसके बाद सदन कुछ देर तक बाधित रहा। विपक्ष ने पलटवार करते हुए कहा कि उनकी बात को सुने बिना लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। अंत में हंगामा शांत कराने के लिए अन्य सांसदों ने दखल दिया और कार्यवाही फिर से शुरू की गई।
यह पूरा विवाद नियम, सम्मान और बोलने के अधिकार के बीच टकराव की वजह से हुआ।
