राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जताई आपत्ति, अनुच्छेद 143(1) के तहत राय मांगी

नई दिल्ली 16 मई — राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल के उस ऐतिहासिक फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति को विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर समय-सीमा के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था। राष्ट्रपति ने इस फैसले को “संवैधानिक मूल्यों के विपरीत” बताते हुए इसे “संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण” करार दिया है।

इस मामले को लेकर राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट से 14 संवैधानिक प्रश्नों पर राय मांगी है। यह प्रावधान बहुत कम मामलों में इस्तेमाल किया गया है, लेकिन राष्ट्रपति और केंद्र सरकार ने इसे इसलिए चुना क्योंकि उन्हें समीक्षा याचिका के माध्यम से सकारात्मक परिणाम की संभावना कम लग रही है, चूंकि वह उसी पीठ के समक्ष जाती है जिसने मूल फैसला दिया था।

सरकार का कहना है कि राष्ट्रपति और राज्यपालों के पास विधेयकों पर निर्णय लेने का संवैधानिक विवेकाधिकार है और उस पर समय-सीमा बांधना कार्यपालिका की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि विधायिका द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चितकाल तक रोके रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है।

सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट को भेजे गए 14 सवालों में यह पूछा गया है कि क्या न्यायपालिका कार्यपालिका के निर्णयों पर समय-सीमा निर्धारित कर सकती है, क्या राष्ट्रपति के संवैधानिक अधिकारों में न्यायिक हस्तक्षेप उचित है, और क्या लोकतंत्र में निर्वाचित विधायिका के निर्णयों को रोका जाना संविधान के अनुरूप है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *