व्याकरण किसी भी भाषा का अहम हिस्सा होता है, जिसके बिना भाषा की समृद्धि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हालांकि, प्रदेश के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों ने स्कूल के हिंदी पाठ्यक्रम से व्याकरण को हटा दिया था। इस पर दुखी होकर एक सेवानिवृत्त शिक्षक ने सात साल तक संघर्ष किया। उन्होंने न केवल सरकारी दफ्तरों और न्यायालयों में इसकी शिकायत की, बल्कि व्याकरण को पाठ्यक्रम में फिर से शामिल करने में सफलता भी हासिल की।
उनकी मेहनत के बाद, राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) की पाठ्यचर्या समिति ने आने वाले शिक्षण सत्र के लिए व्याकरण को पुनः पाठ्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश की। दुर्ग जिले के चंदखुरी गांव के 84 वर्षीय पुरानिक लाल चंद्राकर ने इस संघर्ष को अकेले ही सात साल तक जारी रखा।
पुरानिक लाल चंद्राकर, जो 2003 में शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रिसाली से सेवानिवृत्त हुए थे, ने सेवाकाल में हिंदी और संस्कृत पढ़ाई। इसके बाद, सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने निजी स्कूल में हिंदी पढ़ाना जारी रखा। उन्होंने बताया कि 2018 में माध्यमिक शिक्षा मंडल ने पाठ्यक्रम से व्याकरण हटा लिया था, जिस पर उन्होंने कई बार अधिकारियों से पत्राचार किया, लेकिन कोई समाधान नहीं मिला। आखिरकार, उन्होंने 2021 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसके बाद यह महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।
