नेपिडॉ: म्यांमार बीते चार सालों से राजनीतिक अस्थिरता और गृहयुद्ध के भंवर में फंसा हुआ है। सत्ता पर काबिज सैन्य सरकार और विद्रोही गुटों के बीच संघर्ष लगातार तेज हो रहा है। बगावत की अगुवाई करने वाले कई छोटे-बड़े समूह सेना को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। हाल ही में सेंगियांग क्षेत्र, जो भारत के मणिपुर राज्य से सटा हुआ है, वहां सेना और विद्रोहियों के बीच भीषण लड़ाई छिड़ गई। इस संघर्ष के कारण 3,000 से अधिक नागरिकों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा और मणिपुर हाई अलर्ट पर है।
देशभर में हिंसा, लाखों विस्थापित
म्यांमार में जारी गृहयुद्ध के कारण अब तक 40 लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। हालात इतने खराब हैं कि देश की आधी आबादी गरीबी से जूझ रही है और 50% से भी कम लोगों को बिजली उपलब्ध है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, रेखाइन प्रांत में गंभीर भुखमरी और अकाल का खतरा मंडरा रहा है, जिसका सबसे ज्यादा असर रोहिंग्या मुसलमानों पर पड़ने की आशंका है। रोहिंग्या समुदाय दोहरी मार झेल रहा है—एक तरफ सेना जबरन उनके पुरुषों को भर्ती कर रही है, तो दूसरी ओर विद्रोही संगठन आर्कयन आर्मी उन पर सेना का साथ देने का आरोप लगा रहा है।
सैन्य शासन का सिकुड़ता प्रभाव
2021 में तख्तापलट कर सत्ता पर काबिज हुई सैन्य सरकार अब कई हिस्सों में कमजोर पड़ती दिख रही है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, म्यांमार का सिर्फ 21% इलाका ही सरकार के नियंत्रण में है। सेना को पीपुल्स डिफेंस फोर्स (PDF) और जातीय हथियारबंद समूहों के हमलों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, बड़े शहरों और देश के मध्य भागों पर सेना का कब्जा अभी भी कायम है।
चीन की भूमिका और बदलते समीकरण
पिछले साल तक चीन ने विद्रोही गुटों को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दिया था, क्योंकि वह सीमा पर अपराधियों की गतिविधियों से नाराज था। लेकिन अब चीन ने हथियारों और अन्य आवश्यक आपूर्ति को बंद कर दिया है। माना जा रहा है कि चीन अब चाहता है कि म्यांमार में जल्द चुनाव कराए जाएं, ताकि वहां स्थिरता लौटे और अमेरिकी दखल को रोका जा सके। हालांकि, यह चुनाव मात्र एक दिखावा होंगे, क्योंकि 21,000 से अधिक राजनीतिक कैदी जेलों में बंद हैं, और विपक्षी ताकतों ने पहले ही चुनावों में बाधा डालने की योजना बना ली है।
सेना में असंतोष, बढ़ती बगावत
सैन्य सरकार के मुखिया मिन आंग हलाइंग को सत्ता से हटाने की मांग तेज हो रही है। हाल के वर्षों में कई युवा सेना में भर्ती होने से इनकार कर चुके हैं। सैनिकों के विद्रोह और मौतों की संख्या भी बढ़ रही है।
बॉर्डर क्षेत्रों में सेना का नियंत्रण कमजोर, शरणार्थियों का बढ़ता संकट
बांग्लादेश, भारत, चीन और थाईलैंड की सीमाओं पर सेना का प्रभाव लगातार कम हो रहा है। इस वजह से म्यांमार की सेना के और भी निर्मम रवैया अपनाने की आशंका है। इस बीच, 20,000 से अधिक चिन शरणार्थी म्यांमार से भागकर भारत के मिजोरम राज्य में शरण लिए हुए हैं। वे राज्य के सीमावर्ती जिलों में बनाए गए शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं।
गृहयुद्ध जारी, लेकिन समाधान दूर
चार सालों से सैन्य शासन का दमनचक्र जारी है, लेकिन उनकी कठोर नीतियां भी विद्रोह को रोकने में नाकाम रही हैं। जनता भीषण संकट झेल रही है, लेकिन प्रतिरोध की लहर थमने का नाम नहीं ले रही। ऐसे में म्यांमार का भविष्य अनिश्चितता के अंधकार में डूबा नजर आ रहा है।
