अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की के बीच ओवल ऑफिस में हुई तीखी बहस के बाद पश्चिमी देशों के बीच दरार साफ़ दिखने लगी है। यूरोप अब अमेरिका को भरोसेमंद सहयोगी मानने पर संदेह कर रहा है और अपनी सुरक्षा रणनीति पर नए सिरे से विचार कर रहा है।
यूरोप और अमेरिका के रिश्तों में तनाव
पहले यूरोप अपनी सुरक्षा नीतियों को बनाते समय अमेरिका को केंद्र में रखता था, लेकिन अब वह अमेरिका को अलग रखकर योजनाएं बना रहा है। इस बदलाव का मुख्य कारण यूक्रेन को लेकर ट्रंप की नीतियां हैं, जो यूरोपीय देशों की सोच से मेल नहीं खा रहीं।
यूक्रेन पर रणनीति क्यों बदली?
यूरोप और अमेरिका के बीच पहले एक स्पष्ट रणनीति थी—यूक्रेन को हर हाल में रूस के खिलाफ समर्थन देना। लेकिन ओवल ऑफिस में ज़ेलेंस्की और ट्रंप के बीच गरमागरम बहस के बाद यह रणनीति बिखरती नज़र आ रही है। ट्रंप रूस के साथ बातचीत करके संघर्ष को रोकने के पक्ष में हैं, लेकिन ज़ेलेंस्की बिना किसी ठोस सुरक्षा गारंटी के किसी भी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हैं।
रूस को फायदा क्यों?
इस पूरे घटनाक्रम में रूस को सबसे बड़ा लाभ होता दिख रहा है।
1. सीधी बातचीत: अमेरिका और रूस अगर सीधे बातचीत करते हैं, तो रूस को अलग-थलग करने की पश्चिमी नीति कमजोर हो जाएगी।
2. सीजफायर की मौजूदा सीमाएं: ट्रंप की प्राथमिकता यह लगती है कि मौजूदा युद्ध-रेखा पर ही संघर्ष रोक दिया जाए, जिससे रूस को अपने कब्जे वाले क्षेत्रों पर पकड़ बनाए रखने का मौका मिलेगा।
3. यूरोप-अमेरिका में दरार: अमेरिका और यूरोप की एकजुटता कमजोर होने से रूस की रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी।
क्या अमेरिका अब भरोसेमंद नहीं?
ओवल ऑफिस की घटना के बाद यूरोप के कई देशों में यह सवाल उठ रहा है कि अमेरिका पर कितना भरोसा किया जा सकता है। क्या ट्रंप की नीतियां सिर्फ उनकी व्यक्तिगत सोच का हिस्सा हैं, या फिर अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीति में बदलाव आ रहा है?
अगले कदम क्या हो सकते हैं?
पूर्व राजनयिक सुरेश गोयल का मानना है कि ट्रंप और ज़ेलेंस्की दोनों इस विवाद को ज्यादा नहीं खींचना चाहेंगे, और आने वाले दिनों में इसका कोई न कोई हल निकलेगा। लेकिन सवाल यह है कि यह हल किसके पक्ष में जाएगा—यूक्रेन, यूरोप, अमेरिका या फिर रूस?
