काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह (Balen Shah) को नेपाल की जन-आंदोलन (Gen-Z आंदोलन) में एक करिश्माई चेहरा माना जा रहा है। उन्होंने भ्रष्टाचार, पारदर्शिता की कमी और पारंपरिक दलों की राजनीति से युवाओं की नाराज़गी को आवाज़ दी।
आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री KP शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा।
जन-आंदोलन अब सिर्फ सोशल मीडिया बैन की प्रतिक्रिया नहीं रहा, बल्कि लोकतंत्र, बेरोज़गारी, दमन, सरकारी जवाबदेही की मांग बनी है।
हालाँकि व्यापक समर्थन के बावजूद, बालेंद्र शाह ने अस्थायी सरकार (interim government) की ज़िम्मेदारी सीधे नहीं ली।
उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुषिला कार्की (Sushila Karki) के interim सरकार के नेतृत्व का समर्थन किया और जन-आंदोलन से अपील की कि वे धैर्य रखें और जल्दबाज़ी में निर्णय न लें।
इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं:
1. संवैधानिक/वैधानिक बाधाएँ — क्या मेयर के रूप में शाह की भूमिका PM या interim PM बनने की वैधानिक स्थिति में उपयुक्त है या नहीं।
2. आंतरिक विभाजन — जन-आंदोलन के भीतर विकल्पों की विविधता है: उन लोगों ने सुषिला कार्की, कुलमान घिसिंग (Kulman Ghising), धारान के मेयर हरका सांगपम आदि नामों पर चर्चा की जा रही है।
3. राजनीतिक सुरक्षा और दायित्व — नेतृत्व लेना मतलब पूरी जिम्मेदारी, राजनीतिक हमले, विरोधी दलों का दबाव आदि; कभी-कभी “symbolic नेतृत्व” बेहतर विकल्प हो सकता है बजाय सीधे जिम्मेदारियों में आने के।
4. रणनीति — बालेन शाह संभवतः जन आंदोलन की अगुआई को “मिस्टर लेADER” बनने की बजाय आंदोलन के अस्थायी नेतृत्व की प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखना चाहते हैं ताकि आंदोलन की एकता बनी रहे।
फिलहाल, सेना, राष्ट्रपति और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत जारी है यह तय करने के लिए कि interim सरकार का नेतृत्व कौन करेगा, नए चुनाव कब होंगे, और शांतिपूर्ण परिवर्तन की प्रक्रिया कैसे हो।
