राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद नेपाल में क्यों नहीं हुआ कभी सैन्य तख्तापलट?

नेपाल दक्षिण एशिया का वह देश है, जिसने कई राजनीतिक अस्थिरताओं, राजतंत्र से लोकतंत्र तक के संघर्ष, जन-आंदोलनों और सरकार गिरने जैसी परिस्थितियों का सामना किया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

नेपाल ने राजशाही से लेकर 1990 के दशक में लोकतांत्रिक संघर्ष और 2006 के जनआंदोलन तक बड़े बदलाव देखे। इस दौरान कई सरकारें गिरीं, गठबंधन बने-टूटे, और संवैधानिक संकट आए। लेकिन एक चीज़ नहीं हुई — सैन्य तख्तापलट (Military Coup)।

क्यों नहीं हुआ Coup?

1. सार्वजनिक समर्थन की कमी – नेपाली सेना को कभी जनता का इतना समर्थन नहीं मिला कि वह सत्ता पर सीधे कब्ज़ा कर सके। जनांदोलनों ने हमेशा लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता दी।

2. संसाधनों की सीमाएँ – पाकिस्तान या म्यांमार की तरह नेपाल के पास विशाल सैन्य शक्ति, हथियारों और अंतरराष्ट्रीय बैकअप की कमी है।

3. संवैधानिक भूमिका – नेपाल की सेना संविधान के तहत राष्ट्रपति और सरकार के अधीन रहती है। राजनीतिक हस्तक्षेप सीमित रहा है।

4. राजनीतिक पार्टियों और नागरिक समाज की सक्रियता – नेपाल में जब भी अस्थिरता आई, सिविल सोसाइटी और राजनीतिक दलों ने मिलकर जनांदोलन के रास्ते समाधान खोजा।

5. अंतरराष्ट्रीय दबाव – नेपाल की भौगोलिक स्थिति (भारत और चीन के बीच) के कारण किसी भी सैन्य तख्तापलट की स्थिति को अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति नहीं मिल सकती थी।

आज की स्थिति (2025)

मौजूदा Gen Z आंदोलन, सोशल मीडिया बैन और सरकार के इस्तीफ़े जैसी परिस्थितियों के बावजूद भी सेना ने सत्ता कब्ज़ाने की बजाय केवल कानून-व्यवस्था संभालने और संवाद को बढ़ावा देने की भूमिका निभाई है।

यह नेपाल की खासियत है कि दशकों की उथल-पुथल के बावजूद लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ जीवित रही हैं।

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