रामपुर गांव के बस स्टैंड के किनारे एक पीले रंग का शौचालय खड़ा है। जब इसे पहली बार बनाया गया था तो गांव के लोग खुश थे। सभी को लगा कि अब यात्रियों और ग्रामीणों को सुविधा मिलेगी, और खुले में जाने की परेशानी खत्म हो जाएगी। लेकिन कुछ साल बीतते ही इस शौचालय का हाल ऐसा हो गया कि लोग अब उससे दूर भागते हैं।
सोचिए, एक सुबह है। बस स्टैंड पर लोग अपने-अपने काम के लिए इकट्ठा हुए हैं। कोई दिल्ली जाने वाली बस का इंतजार कर रहा है, तो कोई नोएडा की ओर जाने के लिए खड़ा है। तभी एक यात्री शौचालय की तरफ बढ़ता है, लेकिन दरवाज़े पर पहुंचकर ही वापस लौट आता है। वजह साफ है—भीतर से उठती बदबू और बाहर फैली गंदगी।
शौचालय की दीवारें जगह-जगह टूटी और जंग लगी हुई हैं। पीले रंग पर सफेद और नीले पोस्टरों की भरमार है—कहीं ट्यूशन क्लास का विज्ञापन, कहीं पीजी के नंबर, तो कहीं कमरे किराए पर मिलने की सूचना। आसपास की जमीन पर नालियों का पानी बहता है, और कूड़ा-करकट का अंबार लगा रहता है।
बस स्टैंड के पास दुकान चलाने वाले राजू कहते हैं—“ग्राहक अक्सर शिकायत करते हैं कि यहां खड़े होना मुश्किल है। बदबू इतनी आती है कि खाने-पीने की दुकान पर भी असर पड़ता है।” वहीं गांव के बुज़ुर्ग रामनाथ सिर हिलाते हुए कहते हैं—“सुविधा तो बना दी, लेकिन उसकी देखभाल कौन करेगा? यही सबसे बड़ी दिक्कत है।”
महिलाएं सबसे ज्यादा परेशान हैं। वे बताती हैं कि बच्चों को लेकर यहां से गुजरना मुश्किल हो जाता है। मच्छरों और मक्खियों की वजह से बीमारियों का डर हर वक्त बना रहता है। छोटे बच्चे यहां खेलते हुए आ जाते हैं और गंदगी में गिरने का खतरा बना रहता है।
गांव के लोग कई बार अधिकारियों से शिकायत कर चुके हैं। पर हर बार आश्वासन मिला, काम नहीं हुआ। अब हालात ऐसे हैं कि लोग शौचालय का इस्तेमाल करना तो दूर, उसके पास खड़े होने से भी कतराते हैं।
रामपुर गांव के लोग कहते हैं कि यह शौचालय उनकी उम्मीदों की जगह अब सिरदर्द बन गया है। अगर सफाई और मरम्मत का इंतज़ाम हो जाए तो यह फिर से काम आ सकता है। फिलहाल, लोग यही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद एक दिन उनकी आवाज़ सुनी जाएगी और बस स्टैंड किनारे बना यह शौचालय सचमुच जनता की सुविधा बन सकेगा।
