दीपावली का त्योहार आते ही दीयों की मांग बढ़ जाती है। कुम्हारों का कहना है कि दीया बनाने के लिए सबसे पहले बैतूल के जंगलों से खास मुलायम और साफ मिट्टी मंगवाई जाती है। यह मिट्टी दीयों के लिए बहुत जरूरी होती है क्योंकि इसे गूंथने और आकार देने में आसानी रहती है।
दीया बनाने की प्रक्रिया बहुत मेहनत और समय मांगती है। सबसे पहले मिट्टी को अच्छे से गूंथा जाता है ताकि वह आकार लेने लायक हो। इसके बाद कुम्हार चाक की मदद से दीयों का आकार बनाते हैं। यह काम बड़े ध्यान और धैर्य से किया जाता है। आकार देने के बाद दीयों को धूप में सुखाया जाता है। धूप में सुखाने के बाद दीयों को भट्ठी में पकाया जाता है। पकाने की प्रक्रिया भी बहुत सावधानी मांगती है ताकि दीए फटें नहीं और अच्छे रंग में तैयार हों।
कुम्हार बताते हैं कि हर दीया उनके मेहनत और कुशल हाथों का परिणाम होता है। एक-एक दीया बनाने में समय लगता है, लेकिन त्योहारों में घर-घर दीयों की रौनक देखकर उन्हें संतोष मिलता है। इस तरह, कुम्हारों की मेहनत और हुनर से ही हर घर दीपावली में रोशन होता है।
